रांची : नागपुरी फिल्म इंडस्ट्री में इन दिनों Sereng सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बनी हुई है। रिलीज के बाद जहां एक ओर फिल्म को दर्शकों का भरपूर प्यार मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर इस पर सामाजिक और राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। लेकिन इन सबके बीच एक बात साफ है कि “सेरेंग” ने नागपुरी सिनेमा में एक नया बेंचमार्क स्थापित कर दिया है।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी युवा, ऊर्जावान और विजनरी टीम मानी जा रही है। निर्देशक NPK Purushotam ने जिस तरह झारखंड की जमीनी समस्याओं — पलायन, बेरोजगारी, मानव तस्करी, माओवादी प्रभाव, सामाजिक भेदभाव और आदिवासी समाज के संघर्ष — को कहानी में पिरोया है, उसने दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने का काम किया है। फिल्म प्रसिद्ध लेखक Jaynandan की कहानी “सेराज बैंड बाजा” से प्रेरित बताई जा रही है।
“सेरेंग” की सफलता सिर्फ कहानी तक सीमित नहीं है। फिल्म की मार्केटिंग रणनीति ने भी इसे चर्चा के केंद्र में ला दिया। सोशल मीडिया कैंपेन, लोकल कनेक्ट, युवाओं के बीच प्रचार और डिजिटल प्रमोशन के जरिए फिल्म को लोगों तक प्रभावशाली तरीके से पहुंचाया गया। यही कारण है कि फिल्म रिलीज के बाद लगातार हाउसफुल शो और मजबूत वर्ड ऑफ माउथ के कारण रिकॉर्ड बना रही है।
फिल्म को लेकर विवाद भी सामने आए, जहां कुछ संगठनों ने इसे “लव जिहाद” से जोड़ते हुए विरोध किया। हालांकि फिल्म के निर्देशक ने साफ कहा कि यह किसी धार्मिक एजेंडे की नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों और सामाजिक सच्चाइयों की कहानी है। विवादों के बावजूद दर्शकों की भीड़ सिनेमाघरों तक पहुंची और फिल्म ने पहले ही सप्ताह में रिकॉर्ड कमाई कर नागपुरी फिल्म इंडस्ट्री में नई चर्चा छेड़ दी।
फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का मानना है कि “सेरेंग” ने यह साबित किया है कि अगर कंटेंट मजबूत हो, तकनीकी गुणवत्ता बेहतर हो और मार्केटिंग सही तरीके से की जाए, तो क्षेत्रीय सिनेमा भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकता है। “सेरेंग” अब सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि नागपुरी सिनेमा के नए दौर की पहचान बनती नजर आ रही है।

