रांची: शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन आज मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जा रही है। सुबह से ही विभिन्न दुर्गा मंदिरों और पूजा पंडालों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है। देवी के इस विकराल स्वरूप की उपासना से नकारात्मक शक्तियों, भय और शत्रुओं का नाश होता है।
स्वरूप: अंधकार का नाश करने वाली त्रिनेत्री देवी
मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है। इनका वर्ण घने अंधकार की तरह गहरा काला है। बिखरे हुए बाल, गले में बिजली जैसी चमकती माला और तीन विशाल नेत्र इनके तेज को दर्शाते हैं। देवी गर्दभ (गधा) की सवारी करती हैं और इनकी चार भुजाएं हैं। दाहिना हाथ वरमुद्रा और दूसरा अभय मुद्रा में है, जबकि बाएं हाथों में लोहे का कांटा और खड्ग (कटार) सुशोभित है। दुष्टों का संहार करने के साथ-साथ यह भक्तों को अभय और शुभ फल प्रदान करती हैं, इसलिए इन्हें ‘शुभंकरी’ भी कहा जाता है।
प्रमुख पूजन विधि और प्रिय भोग
- प्रिय भोग: मां कालरात्रि को गुड़ या गुड़ से बनी मिठाइयां (जैसे मालपुआ या गुलगुले) विशेष रूप से अर्पित की जाती हैं। मान्यता है कि इससे आरोग्यता और संकटों से मुक्ति मिलती है।
- प्रिय पुष्प: लाल रंग के फूल, विशेषकर लाल जवाकुसुम (गुड़हल) या रात की रानी का फूल।
- पसंदीदा रंग: आज की पूजा में गहरा नीला या लाल वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है।
पूजा का विशेष मंत्र
या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः।
तांत्रिक और निशीथ काल पूजा का महत्व
नवरात्रि की सप्तमी तिथि को निशा पूजा (मध्यरात्रि पूजा) का खास महत्व है। तंत्र साधना और सिद्धि प्राप्त करने वाले साधक आज की रात विशेष अनुष्ठान करते हैं। आज के दिन पूजा पंडालों में नवपत्रिका प्रवेश और महासप्तमी की विशेष पूजा के साथ सार्वजनिक दुर्गा पूजा के पट पूरी तरह से श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए हैं।

