नवरात्रि का उत्सव और हमारे भीतर विद्यमान दैवीय शक्ति के सात रूपगुरुदेव श्री श्री रविशंकर

देवी भगवती कहीं बाहर नहीं हैं। वे हमारे भीतर जीवनी शक्ति के रूप में विद्यमान हैं; किंतु हम इसका भान कैसे करें? एक सरल बात को जानें, हमारा शरीर माँ के डीएनए से निर्मित हुआ है; और इस शरीर में जो कुछ भी अन्न, फल, आदि के रूप में हमने ग्रहण किया, वह सब प्रकृति माँ से ही आया है और आज हमारे अस्तित्व का भाग बन गया है। जब आप इस संसार में आए, आपका वजन ढाई-तीन किलोग्राम था, और आज आपका वजन पचास से साठ किलोग्राम है। इस प्रकार शरीर और प्रकृति के बीच एक अविभाज्य संबंध है।
साथ ही आपके भीतर की जीवनी ऊर्जा सात विशिष्ट दिव्य शक्तियों के रूप में अभिव्यक्त होती है।देवी माँ के ये सात रूप आपकी प्रत्येक कोशिका, प्रत्येक श्वास और आपके अस्तित्त्व के प्रत्येक क्षण में सजीव हैं।
प्रथम है ब्राह्मी शक्ति, जो सृजन का मूल प्रेरक तत्व है, यह हर बीज, हर पौधे और हर कोशिका में उपस्थित है। आपके शरीर का प्रत्येक अंश सृजन में संलग्न है। एक कोशिका का दूसरी में विभाजन ब्राह्मी शक्ति का ही कार्य है, जिसके बिना कोई सृजन संभव नहीं है। परंतु केवल सृजन पर्याप्त नहीं है। एक बीज को अंकुर बनने के लिए पहले नष्ट होना पड़ता है। यह है माहेश्वरी शक्ति, शिव की वह शक्ति जो हमें व्यापक दृष्टि प्रदान करती है और उस महानता का बोध कराती है, जो हमसे परे है। यदि बचपन का अंत न हो, तो युवावस्था का आगमन कैसे होगा? यहाँ विनाश, अंत नहीं, बल्कि विस्तार की ओर ले जाने वाला मार्ग है।
इसके पश्चात आती है कौमारी शक्ति, कार्तिकेय की सदैव युवा, निर्भीक ऊर्जा। यह साहस, वीरता, नवीनता और ज्ञान की शक्ति है। यही वह शक्ति है जो साधक को ताज़गी, जिज्ञासा और निर्भयता प्रदान करती है।
इसके बाद आती है वैष्णवी शक्ति, जो पालन-पोषण की शक्ति है। जब आप सोते हैं, तब भी आपका हृदय धड़कता रहता है, श्वास चलती रहती है, और रक्त संचार निरंतर होता रहता है। आप इनमें से कुछ भी नहीं करते, यह सब वैष्णवी शक्ति के कारण ही संभव है। ऋतुओं का समय पर बदलना, वर्षा का लौटना, जल-चक्र का पूर्ण होना, सब इसी शक्ति के कारण है।
परंतु हमें इन सब से जोड़े रखने वाली शक्ति कौन-सी है? वह है वाराही शक्ति—पृथ्वी की शक्ति, जो हमें स्थिरता प्रदान करती है। सम्पूर्ण संपदा पृथ्वी में निहित है। यही शक्ति पुनर्चक्रण करती है, कचरे को खाद में परिवर्तित करती है, मिट्टी को उर्वर बनाती है और उसे पुनः जीवंत करती है। इसके बिना हम रुई के समान वायु में उड़ते, निर्बल और आधारहीन हो जाते।
व्यक्ति से परे समष्टि है, जिसकी सामूहिक चेतना होती है। यह है इंद्राणी शक्ति, समूह की जागरूकता की ऊर्जा, जो सहस्र नेत्रों से युक्त है। एक आपका मन है, समष्टि का मन भिन्न है। इंद्राणी वह शक्ति है जो समुदायों, समाजों और सभ्यताओं को सजगता के साथ एकसूत्र में बाँधती है।
अंत में आती है चामुंडा शक्ति, जो नकारात्मकता का विनाश कर जीवन को ऊर्ध्वगामी बनाती है। तमोगुण, जड़ता और अंधकार जब जागरूकता से मिलता है, तो वही मुक्ति का कारण बन जाता है।
ये शक्तियाँ दूरस्थ देवी-देवताओं के रूप में पूजने की वस्तु मात्र नहीं हैं। ये आपके शरीर, मन और चेतना में विद्यमान जीवंत शक्तियाँ हैं। आपकी श्वास वैष्णवी है, आपकी सृजनशीलता ब्राह्मी है, आपका साहस कौमारी है, और आपकी स्थिरता वाराही है।
इसी कारण हमारी परंपरा में हम दिव्यता को हाथी में, घोड़े में, गाय में, छोटी कन्याओं में, और वृद्ध दंपति में, सर्वत्र पहचानते हैं।। हम जीवन-ऊर्जा को वृक्षों, पौधों, अग्नि और जल, सर्वत्र अनुभव करते हैं।
जैसे मक्का बाहर से कठोर होता है, परंतु फूटकर कोमल बन जाता है, वैसे ही दिव्य शक्ति इस ब्रह्मांड में उद्भासित होने की प्रतीक्षा में अंतर्निहित है। जप, ध्यान और भक्ति के माध्यम से यह प्रस्फुटन होता है, यही नवरात्रि का उद्देश्य है।
देवी को केवल मूर्ति में ही नहीं, बल्कि उस जीवन-ऊर्जा के रूप में पहचानिए, जो आपके भीतर और आपके चारों ओर सब कुछ संचालित कर रही है।

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