रांची। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (DSPMU), रांची के न्यू बिल्डिंग परिसर में आज आदिवासी छात्र संघ के अध्यक्ष विवेक तिर्की के नेतृत्व में पारंपरिक आस्था और श्रद्धा के साथ सरना झंडा गड़ी कार्यक्रम का आयोजन किया गया। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी यह पावन कार्यक्रम पूरे विधि-विधान और आदिवासी परंपराओं के अनुरूप संपन्न हुआ। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के 500 से अधिक छात्र-छात्राओं एवं समाज के लोगों ने भाग लेकर अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था का परिचय दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक सरना पूजा से हुई, जिसे मुख्य पुजारी पीटर उराँव ने विधिवत संपन्न कराया। इस अवसर पर सबसे पहले पुराने सरना झंडे को पूजा-अर्चना कर श्रद्धापूर्वक उखाड़ा गया। इसके पश्चात नए सरना झंडे की स्थापना से पूर्व पारंपरिक प्रार्थना एवं प्रवचन किया गया। प्रवचन के दौरान सरना धर्म, प्रकृति पूजा, आदि शक्ति और नीनिम धरम की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए समाज में सत्य, सद्भाव और प्रकृति संरक्षण का संदेश दिया गया।
प्रार्थना में पारंपरिक मंत्रोच्चार के साथ समाज की सुख-शांति, समृद्धि और प्रकृति के संतुलन की कामना की गई। विधिवत पूजा-अर्चना के उपरांत नया सरना झंडा गाड़ा गया, जिससे पूरे परिसर में उत्साह, श्रद्धा और सांस्कृतिक एकता का वातावरण देखने को मिला।
इस अवसर पर आदिवासी छात्र संघ के पूर्व सचिव मोनू लकड़ा, नामकुम प्रखंड अध्यक्ष निशांत तिर्की, उपाध्यक्ष दीपा कच्छप, दिनेश उरांव, लालेश्वर उरांव, सिम्मी मुर्मू, अंशु टोप्पो, किरण उरांव, सुभाषि तिर्की, मनीषा एक्का, बरखा उरांव, सुशील उरांव, निशा तिर्की, सुरभि तिर्की, ममता कुमारी, काजल कुमारी, नवनीत तिग्गा, राजनती कुमारी, सुशीला उरांव सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने सरना धर्म एवं आदिवासी संस्कृति के संरक्षण पर विशेष जोर देते हुए कहा कि ऐसी परंपराएं न केवल हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा भी देती हैं। युवाओं से आह्वान किया गया कि वे अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजें और आने वाली पीढ़ियों तक इसे पहुँचाने का संकल्प लें।
सरना झंडा गड़ी के अवसर पर सभी उपस्थित लोगों ने झंडे में जल अर्पित कर माँ सरना से आशीर्वाद प्राप्त किया और समाज में शांति, समृद्धि एवं भाईचारे की कामना की। कार्यक्रम शांतिपूर्ण एवं अनुशासित वातावरण में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ तथा विश्वविद्यालय परिसर में आदिवासी परंपरा और संस्कृति का जीवंत दृश्य देखने को मिला।
