बंगाल की सियासत में अचानक चर्चा में आई गुमनाम राजनीतिक पार्टी एनसीपीआई

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों जिस एनसीपीआई (नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया) का नाम अचानक सुर्खियों में आया है, वह कोई नया संगठन नहीं है। हालांकि अब तक राष्ट्रीय या राज्य स्तर की राजनीति में उसकी खास पहचान नहीं बन पाई थी, लेकिन तृणमूल कांग्रेस के विद्रोही सांसदों के उससे जुड़ने की चर्चाओं ने इस छोटे राजनीतिक दल को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

चुनाव आयोग के नियमों के तहत एनसीपीआई ने वर्ष 2022 में अपने गठन की सार्वजनिक घोषणा की थी। 13 अक्टूबर 2022 को एक अंग्रेजी समाचार पत्र और एक हिंदी दैनिक में प्रकाशित विज्ञापन के जरिए पार्टी ने अपने गठन, उद्देश्य और संगठनात्मक ढांचे की जानकारी दी थी। विज्ञापन में कहा गया था कि यदि किसी व्यक्ति या संगठन को पार्टी के नाम या गठन पर आपत्ति हो तो वह 30 दिनों के भीतर चुनाव आयोग को अपनी आपत्ति दर्ज करा सकता है।

पार्टी का पंजीकृत कार्यालय हावड़ा जिले के बांकरा क्षेत्र के नटपाड़ा गांव में स्थित है। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार कार्यालय का पता होल्डिंग नंबर 479, नटपाड़ा, बांकरा, हावड़ा है। राजनीतिक रूप से पार्टी की गतिविधियां मुख्य रूप से त्रिपुरा और असम के जनजातीय इलाकों तक सीमित रही हैं। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने कुछ सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन कोई उल्लेखनीय सफलता हासिल नहीं कर सकी।

हाल के दिनों में एनसीपीआई के कार्यालय को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हुई है। कार्यालय के प्रवेश द्वार पर उत्तिय कुंडू नामक व्यक्ति के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदर्शित होने की बात सामने आई है। स्थानीय स्तर पर उन्हें संगठन का प्रमुख चेहरा माना जा रहा है। उनकी तस्वीर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ सामने आई है। वह मूल रूप से मोटिवेशनल स्पीकर के तौर पर काम करते हैं।

हालांकि पार्टी की ओर से उनके पद और भूमिका को लेकर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस के असंतुष्ट सांसदों द्वारा एनसीपीआई को संभावित राजनीतिक मंच के रूप में चुने जाने के पीछे उसकी अपेक्षाकृत छोटी संरचना और संगठनात्मक लचीलापन महत्वपूर्ण कारण हो सकता है। लोकसभा में अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रहे सांसदों के लिए यह दल एक नए राजनीतिक ठिकाने के रूप में उभरा है।

दरअसल, बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़े असंतोष और संगठनात्मक खींचतान के बीच एनसीपीआई पहली बार राज्य की मुख्यधारा की राजनीति में चर्चा का विषय बनी है।

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