गिरिडीह। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पारसनाथ – मधुबन में गुरुवार को आदिवासी समाज की ओर से आयोजित मारंग बुरु धोरागढ़ महासम्मेलन को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए कहा कि प्राकृति के उपासक और इसके संरक्षक आदिवासी समाज का अस्तित्व युगों पुराना प्राचीन इतिहास है। उन्होंने कहा कि संताली आस्था में रचे बसे मांरगबुरु आदिवासी समुदाय के अस्मिता, संस्कृति और स्वाभिमान के प्रतीक हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारी मंशा सभी धर्मों का सम्मान करते हुए आदिवासी समाज के विकास और उत्थान के लिए अधिकारों की रक्षा कर अपेक्षित योगदान करना है। संताली भाषा में दिये गये संबोधन में मुख्यमंत्री ने आदिवासी समाज के धार्मिक, सांस्कृतिक, अधिकार, रूढ़ीवादी प्रथाओं पर चर्चा करते हुए विभिन्न देश और राज्यों नेपाल, बांग्लादेश, नागालैंड, मिजोरम से आए हुए समाज के प्रतिनिधियों को आश्वस्त किया कि वे हमेशा अबुआ समाज के अधिकारों और विकास के लिए सक्रिय रहे हैं और आगे भी रहेंगे।
इसके पूर्व विधायक कल्पना सोरेन ने कहा कि आदिवासी समाज सदियों से अपने अधिकारों और सामाजिक परम्परा को लेकर सजग और संघर्षरत रहा है। संताल समाज अपने अधिकारों को लेना जानता है। उन्होंने एसआईआर की चर्चा करते हुए कहा कि आदिवासी समाज का आस्तिव कागजों के अविष्कार से पहले का है। समाज के लोगों को कागजी प्रमाण की जरूरत नहीं है, लेकिन समाज में अशिक्षा और अधिकारियों की गलती के कारण मतदाता सूची उनका नाम स्थगित करना उचित नहीं है। सम्मेलन के दौरान समापन सत्र में पारसनाथ को लेकर पारित प्रस्ताव की प्रति भी मुख्यमंत्री को सौंपा गया।
इसके पूर्व बुधवार को विश्व प्रसिद्ध तीर्थस्थल पारसनाथ सम्मेद शिखर मधुबन स्थित तलहटी क्षेत्र में दो दिवसीय धर्म सम्मेलन शुुरू हुआ। मरंग बुरु बचाव संघर्ष समिति की ओर से आयोजित सम्मेलन की शुरुआत जुग जाहेरथान में मरंगबुरु की विधि-विधान से पूजा-अर्चना के साथ हुई। सम्मेलन कार्यक्रम में आयोजको की ओर से कई चरणों में पारसनाथ पर्वत पर स्थापित जुग जाहेरथान में मरंग बुरु की पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना कर की गई। पूजा का नेतृत्व हेमंत सोरेन सरकार के मंत्री फागू बेसरा ने किया।
मौके पर बताया गया कि धर्म सम्मेलन का उददेश्य मरंग बुरु की धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्ता और मरंग बुरु के प्रति समाज की आस्था, श्रद्धा और भक्ति को और मजबूत करना है। साथ ही समाज की पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना है। पारसनाथ पर्वत केे संरक्षण को लेकर भी व्यापक चर्चा हुई। दो दिवसीय सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिनिधियों ने सभी धार्मिक कार्यक्रमों में पूरी आस्था और और उत्साह से भाग लिया। इस दौरान प्रतिनिधियों नेपरस्पर सामाजिक मुद्दों पर चर्चा अपने विचार व्यक्त किया। आयोजन को सफल बनाने में महावीर मुर्मू, दिलीप मुर्मू, शशांक बेसरा, महेश मरांडी सहित मरांग बुरु बचाव संघर्ष समिति के सदस्यों का योगदान रहा ।



